कभी मोटर बाइंडिंग का करते थे काम, बकरियां भी थी चराई, अब ‘राजा-महाराजा’ के साथ जाएंगे संसद

बीजेपी नेता सुमेर सिंह सोलंकी को राज्सभा चुनाव में उम्मीदवार बनाने के लिए पार्टी ने अपनी सरकारी नौकरी छोड़ने की शर्त रखी थी

शुक्रवार को हुए राज्यसभा चुनाव (Rajya Sabha Election) में मध्य प्रदेश से बीजेपी के ज्योतिरादित्य सिंधिया और सुमेर सिंह सोलंकी विजयी हुए हैं जबकि कांग्रेस की तरफ से दिग्विजय सिंह जीतकर संसद के उच्च सदन पहुंचे हैं

भोपाल. मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) से राज्यसभा में तीन नाम जाना तय हुए हैं. इनमें से पहला है ज्योतिरादित्य सिंधिया, दूसरा दिग्विजय सिंह और तीसरा सुमेर सिंह सोलंकी (Sumer Singh Solanki) हैं. ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) और दिग्विजय सिंह (Digvijay Singh) राजनीति में किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं लेकिन बीजेपी के दूसरे प्रत्याशी के तौर पर जो चेहरा राज्यसभा (Rajya Sabha Election) पहुंचा है वो अपने आप में कुछ खास है. बीजेपी नेता सुमेर सिंह सोलंकी अपने सरल स्वभाव के लिए जाने जाते हैं. वो आदिवासी हैं और राज्यसभा का टिकट फाइनल होने तक शिक्षक की नौकरी कर रहे थे. सुमेर सिंह सोलंकी का जीवन मुश्किलों से भरा रहा है.

शुक्रवार को राज्यसभा चुनाव वाले दिन न्यूज़ 18 से बातचीत करते हुए उन्होंने अपने अतीत को लेकर कई खुलासे किए. सुमेर सिंह सोलंकी की मानें तो वो बेहद गरीब परिवार से आते हैं. उनके पिता खेती-बाड़ी का काम करते हैं. उन्होंने किशोर अवस्था में बकरियां चराने का भी काम किया है. इतना ही नहीं जब घर की हालत ठीक नहीं थी तो परिवार का सबसे बड़ा बेटा होने के नाते सुमेर सिंह सोलंकी ने मजदूरी भी की. साथ ही मोटर वाइंडिंग का काम भी किया. हालांकि पढ़ने लिखने में होशियार होने की वजह से सुमेर सिंह ने संघर्षों के बीच अपनी पढ़ाई पूरी की और प्रोफेसर की नौकरी हासिल की. सुमेर सिंह सोलंकी अपने ब्लॉक में आजादी के बाद से लेकर अब तक इकलौते पीएचडी होल्डर हैं.

राज्यसभा के टिकट की कहानी है रोचक
सुमेर सिंह सोलंकी का राज्यसभा टिकट फाइनल होने की कहानी दिलचस्प है. जिस दिन बीजेपी की ओर से अपने दूसरे प्रत्याशी का नाम फाइनल किया जाना था उसके ठीक पहले सुमेर सिंह के पास एक फोन आया. उस वक्त सुमेर सिंह सोलंकी कॉलेज में बच्चों को पढ़ा रहे थे. फोन पर उधर से आवाज आई कि सुमेर जी पार्टी आपके लिए कुछ बेहतर सोच रही है. लेकिन शर्त है कि हो सकता है कि जो जिम्मेदारी पार्टी की ओर से दी जाए उसके लिए आपको अपनी नौकरी से इस्तीफा देना पड़े. क्या आप इसके लिए तैयार हैं? तब तक भी सुमेर सिंह को यह पता नहीं था कि उनके साथ क्या होने वाला है. लेकिन उन्होंने जिम्मेदारी लेने की अपनी सहमति दे दी, इसके बाद फोन काट दिया गया. सुमेर सिंह सोलंकी को पता नहीं था कि उनका नाम राज्यसभा चुनाव के लिए तय होने वाला है. सुमेर सिंह को फोन करने वाले शख्स खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान थे. इसके कुछ घंटों बाद सुमेर सिंह सोलंकी ने टीवी पर राज्यसभा के लिए बतौर बीजेपी प्रत्याशी अपना नाम देखा.संघ के करीबी हैं सुमेर सिंह सोलंकी

सुमेर सिंह सोलंकी आदिवासी इलाके में वैसे तो बतौर शिक्षक काम कर रहे थे लेकिन आरएसएस के साथ जुड़कर उन्होंने सामाजिक स्तर पर भी कई काम किए हैं. संघ के बैकग्राउंड की वजह से उनका नाम राज्यसभा के लिए तय किया गया. हालांकि सुमेर सिंह सोलंकी के लिए राज्यसभा का ऑफर स्वीकार करना किसी चुनौती से कम नहीं था क्योंकि इसके लिए उन्हें अपनी नौकरी से इस्तीफा देना था. और जिस वक्त उनका नाम तय किया जा रहा था उस वक्त सियासी गणित के लिहाज से मध्य प्रदेश में सिर्फ एक सीट ही बीजेपी को मिलना तय थी. लेकिन उन्होंने पार्टी के लिए अपनी नौकरी दांव पर लगाई. बाद में बदले राजनीतिक घटनाक्रम के बाद प्रदेश में एक बार फिर बीजेपी की सरकार आई और उसके दोनों उम्मीदवारों के राज्यसभा जाने का रास्ता साफ हो गया.


First published: June 19, 2020, 11:58 PM IST



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