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पढ़िए अमृतसर के 2 सबसे अहम प्रशासनिक पदों पर बैठे बेटों के अपने पिता के प्रति जज्बात

  • पिताजी के आने के एहसास से ही भागकर हम किताबें उठा लेते : डाॅ. सुखचैन सिंह गिल

दैनिक भास्कर

Jun 21, 2020, 07:03 AM IST

अमृतसर. (शिवानी सहगल) मां से ऐसी भावनाएं जुड़ी रहती हैं जो ताउम्र प्यार का अहसास दिलाती हैं मगर पिता वो साया है जिसके तले इंसान पनपते हुए एक बीज से मजबूत पेड़ बनता है। अमृतसर के पुलिस कमिश्नर डाॅ. सुखचैन सिंह गिल अपने पिता 72 वर्षीय मेजर सिंह को कुछ इसी जज्बात के साथ याद करते हैं। डाॅ. गिल कहते हैं, ‘पापा रिटायर्ड सरकारी टीचर हैं। जीवन में उनका एक ही लक्ष्य रहा हम बच्चों को पढ़ाना।

कई बार ऐसा हुआ जब हम खेल रहे होते मगर जैसे ही लगता कि पापा आ रहे हैं, हम भाई-बहन भागकर किताबें उठा लीं। डर इतना कि हम पढ़ते रहते और आधे घंटे बाद पता चलता कि पापा नहीं, कोई और आया था।’
डॉ. सिंह के अनुसार, पिताजी हमेशा कहते थे कि एजुकेशन ही वो जरिया है जिससे इंसान बड़े से बड़ा लक्ष्य पा सकता है। आज हमें पता है कि पढ़ाई के लिए उनकी गंभीरता के चलते ही हम इस मुकाम पर हैं।

पिता की सीख अपने बच्चों को
डॉ. गिल के छोटे भाई यूएसए में कैंसर स्पेशलिस्ट और बहन वहीं पर माइक्रोबायोलॉजी में पीएचडी हैं। पिता से पढ़ाई की वैल्यू समझने जो सीख मिली, वहीं वो अपने दोनों बच्चों को दे रहे हैं। उनका बेटा 7वीं और बेटी 10वीं में है।

पहली बार काॅलेज के फंक्शन में मिलाया पिताजी से हाथ : शिवदुलार सिंह ढिल्लों

डीसी शिवदुलार सिंह ढिल्लों के पिता प्रिथी सिंह ढिल्लों अपने उसूलों के पक्के थे। उनका अपने पिता से रिश्ता ऐसा कि पिताजी ने कभी डांटा नहीं मगर डर पूरा था। शिवदुलार सिंह ढिल्लों कहते हैं, ‘पिताजी पंजाब पुलिस में एसएसपी रहे। वह इतने ईमानदार अफसर थे कि लोग उनकी कसमें खाते थे।’
शुरू से ही पिता को रोल मॉडल मानने वाले शिवदुलार सिंह ढिल्लाें हमेशा से उन्हीं जैसा बनना चाहते थे। स्कूल या काॅलेज लाइफ में कभी पिता के ओहदे का फायदा नहीं उठाया क्योंकि वह जानते थे कि उनके पिताजी कभी गलत का साथ नहीं देंगे।
एक किस्सा सुनाते हुए शिवदुलार सिंह ढिल्लाें कहते हैं, ‘काॅलेज किसी को पता नहीं था कि मैं एसएसपी का बेटा हूं। एनुअल फंक्शन में मुझे ऑलराउंडर स्टूडेंट और दूसरे अवाॅर्ड मिलने थे। उस फंक्शन में गेस्ट के तौर पर चीफ सेक्रेटरी के अलावा मेरे माता-पिता भी पहुंचे थे। गेट पर स्वागत करने वालों की लाइन में मेरी भी ड्यूटी लगी थी।

वहां मैंने पिताजी को वेलकम सर कहते हुए हाथ मिलाया। तब पिताजी ने कुछ नहीं कहा। फंक्शन के बाद टी-टाइम में प्रिंसिपल ने मुझे पास बुलाकर जब पहचान करानी चाही तो पिताजी ने ही बताया कि मैं उनका बेटा हूं। पिताजी को इस बात की खुशी थी कि मैंने अपनी पहचान बताए बगैर सारे ईनाम अपने बूते जीते।’

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