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लॉकडाउन में बोर हुए तो गांव में खोद डाला पशुओं के लिए जोहड़

तरुण जैन, रेवाड़ी

कौन कहता है कि आसमां में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों…। गांव नांधा के कुछ युवाओं ने मिलकर यह बात साबित कर दी है। अपने गांव में जब इन्होंने गर्मी में बिन पानी के पशु-पक्षियों को मरते देखा तो इन्होंने गांव की बणी (जंगल) में एक जोहड़ खोद डाला। वह भी मात्र 10 दिन में। इसके बाद इसमें टैंकरों से पानी डलवाया गया। अब इससे पशु-पक्षियों की प्यास बुझ रही है। यह काम इन्होंने लॉकडाउन के दौरान किया, जिसकी चर्चा अब पूरे गांव में हो रही है।

Bइस डार्क जोन में मिलता है खारा पानीB

पहाड़ी क्षेत्र से घिरे जिले के गांव नांधा में पशुओं व जंगली जानवरों के लिए पानी की कोई व्यवस्था नहीं है। इस कारण पशुओं को इस भीषण गर्मी में दर-दर भटकते हुए अकाल मौत का ग्रास बनना पड़ रहा है। यह डार्क जोन का गांव है और इस गांव का भूमिगत जल खारा है। लॉकडाउन में घरों में कैद कुछ युवाओं ने इन आवारा व जंगली पशुओं के जीवन को बचाने का संकल्प लिया।

Bसभी ने फ्री में दीं सेवाएंB

उन्होंने योजनाबद्ध होकर गांव से डेढ़ किलोमीटर दूर बणी में जोहड़ खोदना शुरू किया। इसके बाद इसे सिमेंटिड कराया। फिर जोहड़ में टैंकरों से पानी लाकर छोड़ा गया। दिलचस्प बात ये है कि युवाओं के अलावा, इस जोहड़ को तैयार करने में योगदान देने वाले राजमिस्त्री व मजदूरों मांघेराम, हंसराज, महावीर, विजय ने एक भी पैसा नहीं लिया। यही नहीं टैंकरों से पानी सप्लाई करने वाले ने भी फ्री सेवा दी है।

Bसूख चुके हैं यहां के सभी तालाबB

यह बणी में एकमात्र ऐसा जोहड़ है, जिसमें पानी है। अन्य सरकारी बांध काफी सालों से सूखे पड़े हैं। केवल बरसात के दिनों में ही इन जोहड़ों में कुछ दिन के लिए पानी ठहरता है। ग्रामीण नरेन्द्र यादव, संजय, जयसिंह, दुष्यंत, हीरालाल ने बताया कि उनका गांव डार्क जोन में है और खारा पानी है। लेकिन जंगली जानवरों के लिए गांव में कोई भी ऐसा जोहड़ नहीं है, जिसमें वे प्यास बुझा सके। युवाओं ने यह सराहनीय कार्य है, इससे अन्य युवाओं को भी प्रेरणा मिलेगी।

Bजब तक बरसात नहीं आती टैंकरों से इसे भरवाते रहेंगेB

जोहड़ के निर्माण में अहम भूमिका निभाने वाले कर्ण सिंह, मास्टर जोगिन्द्र, राकेश, महीपाल, नंदराम, सुमेर, धर्मपाल, जसवंत सिंह, प्रदीप, जितेन्द्र ने बताया कि लॉकडाउन के दौरान वे घर बैठे-बैठे बोर हो गए थे। जब वे बणी में सुबह-शाम को घूमने जाते थे तो भूखे-प्यासे पशुओं की हालत देखी नहीं जाती थी। उन्होंने बताया कि करीब 10 दिन के अंदर इस जोहड़ को तैयार कर लिया गया और 6 टैंकरों से इसमें पानी भी डाल दिया गया। जब तक बरसात नहीं आती है, तब तक इस जोहड़ को टैंकरों से भरवाया जाएगा। उनकी टीम एक ओर अन्य जोहड़ बनाने के लिए रणनीति तैयार कर रही है, जो पहाड़ी के पास बनाया जाएगा।

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